Shatranj Ke Khiladi by Munshi Premchand – Book Review

शतरंज के खिलाड़ी मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित एक लघुकथा है जिसमे एक बार फिर उन्होंने पाठकों के समक्ष समाज का एक आइना प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में १९ स्वी सदी के अवध के उस पक्ष का चित्रण किया गया है जब नवाबों से लेकर आम नागरिक तक  विलासिता में लीन थे। शासन विभाग में, साहित्य क्षेत्र में, सामाजिक अवस्था में, कला कौशल में, उद्योग धंधों में, आहार व्यवहार में सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही थी। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद प्रमोद का वास था। सभी की आँखों में विलासिता का मद छाया हुआ था। संसार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को ख़बर न थी। बटेर लड़ रहे हैं। तीतरों की लड़ाई के लिए पाली बदली  जा रही है। कहीं चौसर बिछी हुई है; पौ-बारह का शोर मचा हुआ है। कहीं शतरंज का घोर संग्राम छिड़ा हुआ है। और इसी विलासिता के मद में अंधी लखनऊ नगरी देख ही नहीं पाई कब अंग्रजों ने अवध पर कब्जा कर लिया।

इस कहानी के दो मुख्य किरदार हैं; मिर्ज़ा सज्जाद अली एवं मीर रौशन अली। यह दोनों वाजिद अली शाह के समय में अवध के दो छोटे छोटे जागीरों के नवाब थे। चूंकि दोनों को जीविका की कोई चिंता नहीं थी, इसलिए दोनों का अधिकांश समय शतरंज की बिसात पर अपनी बुद्धि तीव्र करने में व्यतीत होता था (शतरंज प्रेमियों द्वारा हमेशा यही दलील पेश की जाती थी की इस खेल को खेलने से पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है)। दोनों का शतरंज प्रेम एवं सामाजिक तथा राजनितिक उथल पुथल से अनभिज्ञता की पराकाष्ठा यह थी की दोनों ही अपने नैसर्गिक जिम्मेदारिओं की तरफ़ उदासीन थे।  इसी पृष्ठभूमि में मुंशी प्रेमचंद ने बखूबी १९ स्वी सदी के लखनऊ का चित्रण किया है।

हमेशा की तरह मुंशी प्रेमचंद की भाषा एवं लेखन का अंदाज़ बहुत ही सरल परंतु प्रभावशाली है। कहानी में कुछ उर्दू शब्दों का इस्तेमाल हुआ है परंतु वह हिन्दी के साथ पूरी तरह घुल मिल गया है। इसके अलावा  कहानी के पृष्ठभूमि को देखते हुए यह ज़रूरी भी था। कहानी कुछ इस अंदाज़ से आगे बढती है कि पाठक उसमें पूरी तरह से खो जाता है तथा उत्सुकता से आगे की कहानी जानने की प्रतीक्षा करता है। मुख्य किरदारों के आलावा बाकी के किरदारों का विकास भी बहुत ही सुन्दर तरीके से किया गया है। सभी किरदार किसी ना किसी रूप में इस कहानी को आगे बढ़ने में अपना योगदान देते हैं। लेखक ने हर दृश्य का वर्णन बहुत ही सुन्दर तरीके से किया है।

महान फ़िल्मकार सत्यजित रे ने इस कहानी पर आधारित एक हिन्दी फीचर फ़िल्म भी बनाई है।

अंत में : शतरंज के खिलाडी एक बहुत ही विचारोत्तेजक लघुकथा है। हिन्दी साहित्य प्रेमी जिनकी रूचि ऐतिहासिक कथाओं में है, उन्हें यह ज़रूर पढ़नी चाहिये।

Pic courtesy: Amazon

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